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बड़ी खबर : ईरान – अमेरिका शांति वार्ता ,पाकिस्तान ने भारत इजराइल के पत्रकारों को नहीं दी कवरेज की परमिशन। आखिर क्यों और क्या कारण ? Tap कर जाने

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( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )
नई दिल्ली।
अमेरिका और ईरान के बीच आज इस्लामाबाद में शनिवार सुबह 11 बजे अहम शांति वार्ता शुरू हुई है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। इस बातचीत से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त चेतावनी दी है कि अगर बातचीत सफल नहीं हुई तो बड़ा सैन्य हमला किया जा सकता है।
वहीं, पाकिस्तान ने इस कवरेज के लिए भारत और इजरायल के पत्रकारों को अनुमति नहीं दी है, जिससे इस बैठक को लेकर और भी संवेदनशील माहौल बन गया है।
समझने की बात है कि पाकिस्तान जैसे देश को मध्यस्थता का अवसर क्यों मिला? इसका बहुत सीधा और सुलझा हुआ जवाब है कि युद्ध क्या सोच के अमेरिका न शुरू किया था,क्या उसके अंतिम मकसद थे और क्या वह उन्हें हासिल कर पाया है या नहीं।
जिस तरह से ईरान ने मुकाबला किया इससे अमेरिका यह समझ गया कि वह जो सोच रहा था ईरान उससे कहीं ज्यादा ताकतवर निकला।
लंबे समय तक लड़ना जिससे आर्थिक हानि अमेरिका को लगातार हो रही थी और कहीं न कहीं विश्व बिरादरी भी अमेरिका के युद्ध उन्माद को पसंद नहीं कर रही थी और चाहती थी कि युद्ध शीघ्र खत्म हो।
अमेरिका के मित्र नाटो देश भी इस युद्ध से बाहर रहे जो अमेरिका के लिए एक बड़ा धक्का था।
कहीं न कहीं अमेरिका यह जान गया था कि इस युद्ध को आगे ले जाने का मतलब अमेरिका का बड़ा आर्थिक एवं सैनिक नुकसान है और उसके सुपर पावर होने के पर भी लोगो को संशय होगा।
अब अमेरिका कोई ऐसा तरीका चाहता था जिससे वह अपनी इज्जत बचा कर इस युद्ध से बाहर आ सके और इसके लिए उसे एक ऐसे मध्यस्थ की आवश्यकता थी जो शत प्रतिशत उसके कहने में हो और अहसानों से दबा हो।पाकिस्तान से बेहतर कोई और विकल्प यहां अमेरिका के लिए था ही नहीं।
भारत जो विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था है और जिसके सम्बन्ध अमेरिका,ईरान एवं इजरायल सभी से समान रूप से अच्छे हैं।
अमेरिका कभी भी नहीं चाहेगा कि कोई बड़ा देश जो उसकी बात न माने या अपने असूलों से समझौता करे उसकी मध्यस्थता करे।
उसे ऐसा ही मध्यस्थ चाहिए जहां वह अपनी बात किसी भी तरह से मनवा सके।
जहां तक ईरान की बात है तो वह आज इस स्थिति में है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह घोषित अघोषित रूप से अमेरिका के सामने इस युद्ध में एक विजेता के रूप में ही उभरा है ।
हमेशा हमें यह याद रखना चाहिए कि बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अपने समकक्ष आने वाले देशों को शीघ्र स्वीकार नहीं करते।भारत अभी उसी अवस्था में है।
यह बिल्कुल ऐसा ही है कोई गरीब अचानक से अपनी मेहनत से तरक्की कर जाए तो ऊंचे पायदान पर बैठे लोग पहले यह प्रयास करते हैं को वह गरीब ही रहे,अगर आगे आ भी जाए तो उसे इग्नोर करें या तटस्थ रहें और फिर अंतिम रूप से धीरे धीरे स्वीकार करें।
भारत अभी आर्थिक उन्नति की उसी मध्य स्टेज से गुजर रहा है।

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