( सुनील तनेजा )
ग़ाज़ियाबाद। अधिवक्ता मनीष जैन ने बिना किसी फीस के हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक हरीश राणा का केस लड़ा। वह कहते हैं कि यह मेरी जीत नहीं, बल्कि उन माता-पिता की जीत है, जो अपने जिगर के टुकड़े के लिए 13 वर्षों तक संघर्ष करते रहे।मनीष बताते हैं कि जब हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने आठ नवंबर 2024 को इस मामले में संवेदनशील आदेश दिए। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को हरीश के लिए चिकित्सा सहायता और समुचित देखभाल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। इससे केस को एक नई मानवीय दिशा मिली थी।

ब्रह्माकुमारी लवली दीदी के माध्यम से हुई मुलाकात
मनीष ने बताया कि मोहन नगर में ब्रह्माकुमारी लवली दीदी के माध्यम से उनकी मुलाकात अशोक राणा से हुई। दीदी ने अनुरोध किया कि अदालत के जरिये मदद करें। पहले दिल्ली हाईकोर्ट, फिर 2024 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई। मनीष कहते हैं कि यह केस सिर्फ कानूनी बहस नहीं था, बल्कि एक पिता और मां की टूटी उम्मीदों की कहानी था। वेंटिलेटर पर अपने बेटे को हर दिन देखना किसी भी इंसान के लिए असहनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने कानून के साथ करुणा को भी महत्व दिया। मनीष कहते हैं कि अगर इस फैसले से एक पिता को मानसिक शांति और एक बेटे को पीड़ा से मुक्ति मिली तो यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।
2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता कुमार धनंजय कहते हैं कि यह फैसला वर्ष 2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित है। भारत में यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोर्ट ने सीधे तौर पर इच्छामृत्यु की मंजूरी दी। अदालत ने एम्स को निर्देश दिए कि हरीश के जीवन रक्षक उपकरण गरिमा के साथ हटाए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो। यह निर्णय भविष्य में उन परिवारों के लिए रास्ता खोलेगा, जो असाध्य बीमारी और निरंतर पीड़ा से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि जीवन की गरिमा, केवल जीवन को खींचते रहने में नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई में भी होती है।

रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता
अधिवक्ता डॉ. राजकुमार चौहान कहते हैं कि 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति भारतीय संवैधानिक कानून में महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को स्पष्ट करता है। हालांकि, यह फैसला मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों को दर्शाता है, लेकिन यह भारत में जीवन के अंतिम चरण से जुड़े कानूनों की कमियों को भी उजागर करता है। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी।
कानून बनाने की जरूरत

अधिवक्ता देवाशीष कहते हैं कि चिंताजनक पहलू यह है कि इस विषय पर संसद ने अब तक कोई व्यापक कानून नहीं बनाया। नैतिक, सामाजिक व चिकित्सा से जुड़े जटिल प्रश्नों पर संसद में चर्चा और कानून निर्माण होना चाहिए। यह फैसला मानवीय संवेदना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है तो संसद के लिए एक स्पष्ट संकेत भी है कि इच्छामृत्यु और जीवन के अंतिम चरण से जुड़े विषय पर व्यापक और स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए।
संसद ने अब तक कोई व्यापक कानून नहीं बनाया
अधिवक्ता पायल कहती हैं, चिंताजनक पहलू यह है कि इस विषय पर संसद ने अब तक कोई व्यापक कानून नहीं बनाया। नैतिक, सामाजिक व चिकित्सा से जुड़े जटिल प्रश्नों पर संसद में चर्चा और कानून निर्माण होना चाहिए। यह फैसला संसद के लिए स्पष्ट संकेत भी है कि इच्छामृत्यु व जीवन के अंतिम चरण से जुड़े विषय पर व्यापक और स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए।

तीन दिन में एम्स में शिफ्ट हो सकते हैं हरीश राणा
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में रहने वाले हरीश राणा को अगले तीन दिन के अंदर दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया जा सकता है। पिता अशोक राणा ने बताया कि पिछले 13 वर्ष से बिस्तर पर असहनीय पीड़ा झेल रहे हरीश को सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद तीन डॉक्टरों की टीम गठित की जा रही है।
इस टीम की देखरेख में यह पूरी प्रक्रिया पूरी होगी। हालांकि, परिवार पूरे मामले को गोपनीय रखना चाहता है और बेटे के अंतिम समय को शांति से गुजारना चाहता है। बृहस्पतिवार को अशोक राणा ने नम आंखों से बताया कि हमने बहुत प्रयास किए, लेकिन बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
अब वह अपने अंतिम सफर पर निकल रहा है, इसलिए हम शांति चाहते हैं। हमारे इस पीड़ादायक समय में सभी से अपील है कि वे हमारे फैसले का सम्मान करें। कोई भीड़ शोर-शराबा न हो। उन्होंने बताया कि डॉक्टरों की टीम बनते ही बेटे को एम्स में शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसमें 24 घंटे से 72 घंटे तक लग सकते हैं। इस दौरान वह सिस्टम से नाराज भी नजर आए।
शायद कोई पुराना लेन-देन रहा होगा
अशोक राणा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानवता भरा है। उन्हें बेटे के लिए बहुत दुख है, लेकिन शायद किसी पुराने लेन-देन के कारण यह सब देखना पड़ा। उन्होंने कहा कि अभी उन्हें आदेश की आधिकारिक कॉपी नहीं मिली है, लेकिन कुछ अन्य स्रोतों से जानकारी मिली है। उन्होंने कहा कि जैसे ही आदेश पढ़ेंगे, पूरी स्थिति साफ हो जाएगी।

सोसायटी में पसरा रहा सन्नाटा
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सोसायटी में मीडिया सहित आसपास के लोगों की भारी भीड़ देखी गई थी, लेकिन बृहस्पतिवार को सन्नाटा पसरा रहा। अशोक राणा ने कहा कि कुछ लोग अब इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि शांति से रहने नहीं दे रहे। आंसुओं से डबडबाई आंखों और भर्राए स्वर में उन्होंने कहा कि बेटे के अंतिम समय पर चैन से रहने दें।
यह है मामला
जुलाई 2010 में हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे। इसी दौरान अगस्त 2013 में रक्षाबंधन वाले दिन बहन से मोबाइल फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर रूप से घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उसे दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित है।
इस स्थिति में उसके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए। हरीश के असहनीय दर्द और शारीरिक अक्षमता के कारण माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की, जिसे 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी।







