Big News For the first time Haridwar history of Kumbh and Ardh Kumbh fairs, a woman IAS officer has been given the command Slider States Uttarakhand

बड़ी खबर : कुंभ और अर्धकुंभ मेलों के इतिहास में पहली बार किसी IAS महिला अधिकारी को मेला प्रशासन की मिली कमान। आखिर क्यों कहा गया “वंडर वुमन …..”? Tap कर जाने 

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( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )

हरिद्वार।कुंभ और अर्धकुंभ मेलों के इतिहास में पहली बार किसी IAS महिला अधिकारी को मेला प्रशासन की कमान सौंपी गई है, और यह जिम्मेदारी सोनिका सिंह के कंधों पर है। इन दिनों मेला अधिकारी समयबद्धता, गुणवत्ता और प्रशासनिक दक्षता के साथ कुंभ कार्यों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। यह “वंडर वुमन” न केवल हरिद्वार की आध्यात्मिक धड़कनों को समझने की कोशिश कर रही हैं, बल्कि उस शहर के स्वभाव को भी परख रही हैं, जहाँ आस्था और व्यवस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

इसके पीछे वजह भी बड़ी है। अर्धकुंभ मेला 2027 की लगभग चार माह लंबी अवधि के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, सुरक्षा और सुविधाओं का समुचित प्रबंधन करना किसी भी अधिकारी के लिए परीक्षा से कम नहीं होता । हर स्नान पर्व प्रशासनिक कौशल, त्वरित निर्णय क्षमता और संत समाज के साथ निरंतर संवाद की कसौटी साबित होगा।

जब अर्धकुंभ मेला 2027 के लिए सोनिका सिंह के नाम की घोषणा हुई, तो पत्रकारों और प्रशासनिक हलकों में स्वाभाविक रूप से यह चर्चा छिड़ गई कि साधु-संतों, महंतों और नागा संन्यासियों के विशाल और प्रभावशाली संसार के बीच तालमेल बैठाना उनके लिए कितनी बड़ी चुनौती होगा। लेकिन तैनाती के बाद उनकी कार्यशैली और आत्मविश्वास ने इन आशंकाओं को धीरे-धीरे निर्मूल सा साबित कर दिया।

राज्य अतिथि गृह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के संतों के बीच उनकी एक खास मुद्रा ने सबका ध्यान खींचा—कमर पर हाथ रखकर दृढ़ता से खड़े होने की मुद्रा। अंग्रेज़ी में इसे Arms Akimbo कहा जाता है। बॉडी लैंग्वेज की दुनिया में यह मुद्रा आत्मविश्वास, अधिकार, नेतृत्व और निर्णय क्षमता का प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि इसे लोकप्रिय रूप से “वंडर वुमन पोज़” भी कहा जाता है।

सोनिका सिंह की कार्यशैली में यह आत्मविश्वास साफ झलकता है। अब हरिद्वार की जनता और संत समाज की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विशाल कुंभ बजट और प्रशासनिक संसाधनों का उपयोग कर वह शहर को कितने स्थायी प्रकृति के विकास कार्यों की सौगात दे पाती हैं। 

यदि उनकी योजनाएँ सफल रहीं, तो अर्धकुंभ 2027 केवल आस्था का महापर्व ही नहीं, बल्कि हरिद्वार के दीर्घकालिक विकास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी साबित हो सकता है।

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