( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )
नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटे चली मैराथन वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ईरान से रियायतें हासिल किए बिना लौट गए, जिससे ट्रंप प्रशासन के सामने आगे की रणनीति को लेकर गंभीर दुविधा खड़ी हो गई है।
वेंस ने संकेत दिया कि अमेरिका ने ईरान को ले लो या छोड़ दो वाला अंतिम प्रस्ताव दिया था, जिसमें परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से समाप्त करने की मांग शामिल थी। लेकिन ईरान ने इसे स्वीकार नहीं किया।
अमेरिका के सामने दो ऑप्शन
अब अमेरिका के सामने दो प्रमुख विकल्प हैं- पहला, ईरान के साथ लंबी और जटिल कूटनीतिक वार्ता जारी रखना, और दूसरा, उस सैन्य संघर्ष को फिर से शुरू करना जिसने पहले ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
दोनों विकल्पों में बड़े जोखिम
विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों विकल्पों में बड़े जोखिम हैं। युद्ध की स्थिति लौटने पर तेल आपूर्ति, गैस की कीमतों और वैश्विक बाजारों पर गंभीर असर पड़ सकता है, जबकि लंबी वार्ता राजनीतिक और रणनीतिक रूप से थकाऊ साबित हो सकती है।
इस बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है। ईरान ने इसे अपने दबाव के प्रमुख साधन के रूप में इस्तेमाल करते हुए प्रतिबंध हटाने, युद्ध क्षति की भरपाई और आर्थिक रियायतों की मांग की है, जिसे अमेरिका ने अस्वीकार कर दिया है।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि हालिया सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ने बढ़त हासिल की है, वहीं ईरान भी खुद को मजबूत स्थिति में मान रहा है। दोनों पक्षों के इस रुख के कारण समझौते की संभावना फिलहाल कमजोर दिख रही है।
21 अप्रैल को संघर्षविराम की समयसीमा समाप्त होने के साथ ही स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती है। ऐसे में दुनिया की नजर अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले कदम पर टिकी है।





