* पश्चिम एशिया संकट से महंगाई का खतरा
* अगस्त में कई जरूरी सामान होंगे महंगे
* कंपनियों पर बढ़ रहा है मार्जिन प्रेशर
* त्योहारी सीजन से पहले बिगड़ेगा बजट
* शिपिंग और फ्रेट रेट में भारी उछाल
( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया के तनाव और महंगे शिपिंग खर्च ने आम आदमी की नींद उड़ा दी है। अगस्त और सितंबर के महीने में चाय से लेकर टीवी और गाड़ियां तक कई सामान महंगे होने की पूरी आशंका है, जिससे आपकी रसोई का बजट बुरी तरह गड़बड़ा सकता है।
हर साल जब त्योहारी सीजन पास आता है, तो घरों में खुशियों और खरीदारी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लेकिन इस बार बाजार का मिजाज कुछ अलग ही इशारा कर रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले हफ्तों में बाजार में एक ऐसा भूचाल आने वाला है जो आपकी जेब पर सीधा असर डालेगा. अगस्त के महीने में देश के आम आदमी को एक साथ कई मोर्चो पर महंगाई की मार झेलनी पड़ सकती है। इस बार की महंगाई सिर्फ सब्जियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका
दायरा बहुत बड़ा होने वाला है।
घरेलू बजट पर मंडराता नया संकट क्या है?
सावन का महीना खत्म होते ही देश में फेस्टिव सीजन की आहट शुरू हो जाती है। घरों में नई गाड़ियों की बुकिंग, नए कपड़ों की खरीदरी और त्योहारों की मिठाइयों के प्लान बनने लगते हैं. लेकिन इस बार बाजार का मिजाज आपकी इन खुशियों पर पानी फेर सकता है। पश्चिम एशिया में सुलग रही जंग और ग्लोबल सप्लाई चेन में आई रुकावटों के कारण भारत में एक बार फिर महंगाई का ऐसा चक्र चलने वाला है, जो सीधे आपकी रसोई और तिजोरी पर चोट करेगा। अगस्त और सितंबर के इन दो महीनों में आम आदमी को कई मोर्चों पर तगड़ा झटका लगने की पूरी तैयारी हो चुकी है।
चाय से लेकर कार तक क्यों जेब पर पड़ेगी कैंची
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और समुद्र में बढ़ते शिपिंग खर्च के कारण इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट दोनों महंगे हो गए हैं। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने कंपनियों की कमर तोड़ दी है। यही वजह है कि देश की कई बड़ी कंपनियां अगस्त के महीने में ही अपने उत्पादों के दाम तीसरी बार बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं. रिपोर्ट के मुताबिक चाय की चुस्की से लेकर नया टीवी खरीदने, कपड़े बनवाने और नई कार घर लाने तक, हर जगह आपको ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर के समान भी इस बढ़ोतरी से अछूते नहीं रहने वाले हैं। एक नजर में समझें सेक्टरवार असर
| उत्पाद श्रेणी | महंगाई का मुख्य कारण | आम आदमी के बजट पर असर |
| चाय और एफएमसीजी | सप्लाई चेन में बाधा और आयात लागत में वृद्धि | रसोई के मासिक खर्च में सीधा इजाफा |
| कार और वाहन | लॉजिस्टिक्स खर्च और कच्चे माल की महंगी लागत | ऑटोमोबाइल की खरीद पर जेब ढीली करनी होगी |
| टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स | शिपिंग फ्रेट रेट में उछाल और महंगे कंपोनेंट्स | त्योहारी सीजन में गैजेट्स खरीदना पड़ेगा महंगा |
| कपड़े और अपैरल | उत्पादन लागत बढ़ना और रुपये की कमजोरी | खुदरा बाजार में कपड़ों के दाम चढ़ेंगे |
कंपनियों का मार्जिन प्रेशर और लॉजिस्टिक्स का खेल
आखिर कंपनियां बार-बार दाम क्यों बढ़ा रही हैं? यह सवाल हर समझदार उपभोक्ता के मन में आता है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों से ग्लोबल फ्रेट रेट और शिपिंग कॉस्ट में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। पश्चिम एशिया के तनाव के कारण जहाजों को लंबे रूट से गुजरना पड़ रहा है, जिससे ईंधन का खर्च और समय दोनों बढ़ गए हैं। कंपनियों का ऑपरेटिंग मार्जिन बुरी तरह दबाव में आ चुका है। अपने मुनाफे को बनाए रखने के लिए कॉरपोरेट जगत इस बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ सीधा आम जनता पर डाल रहा है, जिससे मिडिल क्लास की सेविंग्स तेजी से घट रही हैं।
UNCTAD जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया संकट (विशेषकर लाल सागर / हूती विद्रोहियों के हमलों) के कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ रहा है। इसके कारण एशिया से यूरोप और अमेरिका जाने वाले मार्गों पर शिपिंग लागत में 150% से 200% तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मानक 40-फुट कंटेनर (FEU) का किराया जो संकट से पहले काफी कम था, वह उछलकर कई गुना बढ़ गया है, जिसका सीधा
असर आयातित कच्चे माल पर पड़ा है।
शिपिंग और लॉजिस्टिक्स लागत में उछाल
| पैमाना (Metrics) | संकट से पहले की स्थिति (Pre-Crisis) | वर्तमान स्थिति (Current Crisis) | बदलाव / वृद्धि (Percentage Increase) |
| रूट (Route) | लाल सागर / स्वेज नहर (छोटा रास्ता) | केप ऑफ गुड होप (लगभग 10-14 दिन लंबा रास्ता) | समय और ईंधन में भारी अतिरिक्त खर्च |
| शिपिंग लागत (Freight Cost) | मानक स्तर पर नियंत्रित | अत्यधिक उच्च | 150% से 200% तक की भारी वृद्धि |
| 40-फुट कंटेनर (FEU) किराया | कम / स्थिर दरें | कई गुना बढ़ा हुआ | भारी उछाल (सीधा असर कच्चे माल पर) |
कॉर्पोरेट डेटा: एफएमसीजी (FMCG) और ऑटोमोबाइल सेक्टर की प्रमुख कंपनियों की हालिया तिमाहियों की रिपोर्ट बताती है कि इनपुट कॉस्ट (कच्चे माल की लागत) बढ़ने के कारण उनके ऑपरेटिंग मार्जिन में 100 से 200 बेसिस पॉइंट्स (1% से 2%) की गिरावट आई है. इसी मार्जिन को बचाने के लिए कंपनियां अपने उत्पादों के दाम 5% से 12% तक बढ़ाने पर मजबूर हैं।
त्योहारी सीजन से पहले क्या है स्मार्ट प्लानिंग?
हर साल त्योहारी सीजन के दौरान कंपनियां लुभावने डिस्काउंट और ऑफर्स लेकर आती हैं। लेकिन इस बार समीकरण बिल्कुल अलग हैं. जब कीमतें पहले ही 10 से 15 प्रतिशत बढ़ चुकी होंगी, तब मिलने वाला फेस्टिव डिस्काउंट भी आपको कोई खास राहत नहीं दे पाएगा. ऐसे में समझदारी इसी में है कि अपनी जरूरी खरीदारी की एक लिस्ट अभी तैयार कर ली जाए. अगर आपको कोई बड़ी इलेक्ट्रॉनिक वस्तु, गाड़ी या लंबे समय तक चलने वाला सामान खरीदना है, तो कीमतों में और अधिक
उछाल आने से पहले ही कदम उठना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
त्योहारी सीजन से पहले खरीदारी करने का सही समय
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि अगर आप आने वाले महीनों में कोई बड़ी खरीदारी जैसे कार, टीवी या इलेक्ट्रॉनिक सामान लेने की सोच रहे हैं, तो थोड़ी सावधानी जरूरी है। त्योहारी सीजन ठीक सिर पर है और जानकारों का मानना है कि इस बार फेस्टिव डिस्काउंट का फायदा भी बढ़ी हुई कीमतों की वजह से फीका पड़ सकता है। ऐसे में बाजार के जानकारों की सलाह है कि अपनी जरूरत के सामानों की लिस्ट अभी बना लें और कीमतों में बड़ा उछाल आने से पहले ही खरीदारी करना समझदारी का कदम साबित हो सकता है ताकि त्योहारों के समय आपकी जेब पर कम से कम दबाव पड़े।


