Big News Bihar March 30th is going to be special for Bihar, Nitish becomes the centre National Patna political heat Politics Slider States

बड़ी खबर : बिहार में 365 दिन राजनितिक सक्रियता है तो 30 मार्च बिहार के लिए होने वाला है ख़ास,नितीश बने चर्चा का केंद्र । आखिर क्यों और क्या है चर्चा कारण ? Tap कर जाने  

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( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )
पटना। राजनीतिक सक्रियता सीखनी हो तो बेहतर अध्ययन केंद्र हो सकता है।  बिहार के अलावा देश का शायद ही कोई सूबा होगा, जहां राजनीतिक सक्रियता इतनी दिखती हो।  365 दिन बिहार में राजनीतिक सरगर्मी रहती है।  यह स्थिति आजादी के आंदोलन से लेकर अब तक बनी हुई है।  बिहार से शुरू हुए 1974 के देशव्यापी जेपी मूवमेंट को भी आजादी की दूसरी लड़ाई माना गया।  1990 में लालू यादव ने सत्ता संभालते ही मुस्लिम-यादव की करीब 30-31 प्रतिशत आबादी को एम-वाय समीकरण बना कर उनमें राजनीति सक्रियता का संचार किया, तो अगड़ी-पिछड़ी जातियों को अगड़े-पिछड़े जमात में में बांट कर लालू ने जो कमाल किया, उसका उन्हें जबरदस्त राजनीतिक लाभ मिला।  15 साल तक लालू और उनकी पत्नी ने बिहार पर राज किया।  लालू-राबड़ी ने शासकीय विफलताओं की वजह से जब से नीतीश कुमार के हाथ सत्ता गंवाई, बिहार में राजनीतिक चर्चा का विषय बदल गया।  ‘अपहरण उद्योग’ की जगह सुशासन और भ्रष्टाचार के स्थान पर विकास की बात होने लगी।  यह स्थिति 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों तक बनी रही, लेकिन नीतीश ने जब से भाजपा से अलग होकर इधर-उधर की आवाजाही शुरू की, तब से कई तरह की चर्चाएं चलती रहती हैं।  इन सबके के केंद्र में नीतीश ही होते हैं।  नीतीश को लेकर फिर चर्चा शुरू हो गई है। 
नीतीश फिर बने चर्चा का केंद्र
नीतीश कुमार को लेकर इस बार अजीब बहस छिड़ी हुई है।  विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि वे अब पहले जैसे नहीं रहे।  न उम्र बची और न उनका दिमाग ही पहले जैसा काम कर रहा है।  उनकी यह स्थिति भांप कर भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है।  विपक्ष के पास इसके तर्क भी हैं।  पहला तर्क कि नीतीश भाजपा के साथ क्यों हैं? सीएम के रूप में अब तक गृह विभाग अपने से अलग नहीं करने वाले नीतीश ने इसे भाजपा की बात मान कर सम्राट चौधरी को क्यों दिया? नीतीश का दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहने का विपक्षी तर्क है कि उन्होंने राबड़ी देवी को लड़की कहा।  जनसंख्या नियंत्रण पर भरे सदन में उन्होंने महिला-पुरुष के संबंधों पर जो टिप्पणी की, वैसा संतुलित दिमाग का आदमी कर ही नहीं सकता।  नीतीश अगर राज्यसभा जा रहे हैं तो यह भाजपा की साज़िश है।  विपक्ष इतने आरोपों के बाद भी नीतीश कुमार से ‘खेल’ का ख्याली पुलाव पकाने में पीछे नहीं है।  2015 और 2022 में लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने नीतीश के जिस खेल का लाभ लिया है, उसका लोभ अब भी बरकरार है। 
चर्चा की वजह राज्यसभा चुनाव
अपने लंबे संसदीय जीवन में नीतीश कुमार लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं।  उन्होंने चौथे विधायी सदन राज्यसभा जाने की स्वयं इच्छा जताई।  नामांकन दाखिल किया और जीत भी दर्ज कर ली।  वे विधान परिषद के सदस्य के नाते सीएम हैं।  राज्यसभा जाने पर उन्हें विधान परिषद की सदस्यता छोड़नी पड़ेगी।  उनके पास एक और विकल्प है।  उन्हें निर्वाचन के 14 दिनों के अंदर विधान परिषद से इस्तीफा देना पड़ेगा।  वे 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए।  उन्हें 30 मार्च तक किसी एक सदन से इस्तीफा देना पड़ेगा।  अगर वे विधान परिषद से इस्तीफा 30 तक नहीं देते हैं तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाएगी।  इसी बात को लेकर बिहार ही नहीं, बल्कि देश भर में नीतीश कुमार की चर्चा हो रही है। 

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