* संस्थापक सदस्यों और GS की मानसिकता ने 25 साल पुरानी संस्था पर लगाया ग्रहण।
( ब्यूरो ,न्यूज़ 1 हिन्दुस्तान )
गाजियाबाद। देश-विदेश तक बरगदियों की पताका फहरा रही 27 साल पुरानी संस्था इलाहाबाद विश्वविद्यालय पुराछात्र संघ (अउआ) पर संस्थापक सदस्यों और GS की मानसिकता ने ग्रहण लगा दिया । रविवार को ग़ाज़ियाबाद स्थित एक होटल में हुई संस्था की सालाना बैठक में नई कार्यकारिणी का चुनाव होना था। लेकिन वर्षों से संस्था को हांक रहे कुछ पूर्व छात्रों ने चुनाव प्रक्रिया को धता बताकर ऐसा हंगामा बरपाया कि संस्था में दो-फाड़ की नौबत आ गई है ।

दिनभर चलने वाले कार्यक्रम में लंच तक सबकुछ ठीक चला पर लंच उपरांत जब चुनाव करने की बात आई तो संस्थापक सदस्यों और GS तथा आजीवन सदस्यों के घंटों हंमामे के बाद चुनाव आखिर सम्पन्न नहीं हो पाया और दूर-दूर से आए पूर्व छात्रों को आखिर निराश होकर वापस लौट जाना पड़ा।

दरअसल, पूर्व पीसीएस जे. सिंह की अध्यक्षता में अधिवक्ता दिनेश श्रीवास्तव व प्रतीक बिल्डर्स के प्रबंधक आलोक सिन्हा की समिति बनाकर नई कार्यकारिणी के चुनाव सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी दी गई थी। चुनाव समिति ने पहले 15, फिर 26 सितम्बर तक आॅनलाइन नामांकन मांगे थे। इस बीच दिनेश श्रीवास्तव ने चुनाव समिति से इस्तीफा देकर खुद ही अध्यक्ष पद का नामांकन दाखिल कर दिया। इस पद के लिये निवर्तमान अध्यक्ष पूर्व आईएएस एस के सिंह ने भी अपना नामांकन दाखिल किया था। तीसरे प्रत्याशी सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता उज्जवल कुमार ने चूंकि उपाध्यक्ष पद के लिये भी पर्चा भरा था, लिहाजा उन्होंने ऐलान किया कि यदि एस के सिंह और डीसी श्रीवास्तव आपस में सामंजस्य बनाकर किसी एक को अध्यक्ष बनाने के लिये राजी हो जाएं तो वे अपना नामांकन वापस ले लेंगे। दूसरी ओर यही स्थिति महासचिव पद के लिये नामांकन करने वाले उत्तराखंड से प्रो. अमित जायसवाल व लखनऊ से अधिवक्ता अमित सिंह की थी।

चुनाव अधिकारी जे. सिंह ने इन प्रत्याशियों से अपील की कि वे आपसी सामंजस्य बना लें और चुनाव की नौबत न आने दें। लेकिन मौके पर मौजूद पूर्व छात्र दो धड़ों में बंट गए। अधिकांश सदस्य एस के सिंह को ही फिर से अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थे। लेकिन पूर्व पीसीएस राजकुमार सचान का गुट डीसी श्रीवास्तव का पक्षधर था। यही स्थिति महासचिव पद को लेकर थी।

घंटों कोशिश के बावजूद सहमति नहीं बनी। इसी बीच मंच पर खुद ही बैठ गए पूर्व महासचिव शीतलाशंकर मिश्र ने माइक संभाल लिया और चुनाव को स्थगित करने और फरवरी में सालाना बैठक बुलाने का ऐलान कर दिया। फिर तो ऐसा हंगामा बरपा कि संभाले नहीं संभला। दूरस्थ शहरों से आए सदस्यों ने मौके पर ही चुनाव कराने की मांग की, जिसका सचान गुट ने विरोध किया और कहा कि चुनाव नहीं, मनोनयन होगा। यहाँ आपको बताना जरुरी है कि संगठन बायलॉज में निर्वाचन / चुनाव अंकित है। इसी बीच निवर्तमान महासचिव डॉ. शिखा दरबारी ने कह दिया कि नामांकन मान्य नहीं होंगे। यही नहीं, उन्होंने खुद को ही अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया, जिसका भारी विरोध हुआ।

इस बीच मांग उठी कि अजय औदीच्य, उज्जवल कुमार और ब्रजेश शुक्ला को नियमानुसार निर्विरोध उपाध्यक्ष घोषित किया जाए। सचान गुट ने इस मांग का विरोध किया और कहा कि नामांकन स्वीकार नहीं किये जाएंगे। इस तरह हंगामा और ज्यादा बढ़ता रहा। सुबह 11 बजे से शुरू होकर शाम पांच बजे तक माथापच्ची और हंगामे का दौर चला लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकाला। आखिरकार मौके पर मौजूद बड़ी संख्या में पूर्व छात्रों ने ऐलान कर दिया कि वे अखिल भारतीय स्तर पर अपनी अलग संस्था बना लेंगे, लेकिन अउआ में मठाधीश मानसिकता वालों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। हंगामा यहां तक पहुंच गया कि बस हाथापाई ही बाकी रह गई थी। बैठक में मंचासीन अउआ के वरिष्ठ सदस्य पूर्व आईएएस सीपी पांडे व उषारमण त्रिपाठी और डीके राय ने इस स्थिति को शर्मनाक कहा और मंच से उतरकर चले गए।

सालाना बैठक में एस के सिंह, डॉ. शिखा दरबारी, अजय औदीच्य, आदेश शर्मा, अखिलेश शर्मा, रमेश शर्मा, आलोक सिन्हा, प्रो. अमित जायसवाल, अमित सिंह, अमिताभ तिवारी, बीएन सिंह, ब्रजेश शुक्ला, दीप वर्धन, दिग्विजय कुमार सिंह, डीसी श्रीवास्तव, दीपक मिश्रा, ज्ञानप्रकाश पांडे, डॉ. कुलभूषण त्रिपाठी, एडवोकेट हाईकोर्ट प्रदीप कुमार तिवारी, राजेन्द्र सिंह असवाल, राजकुमार सचान, रजनीश कर्णवाल, श्रवण कुमार, शीतलाशंकर विजय मिश्र, सुशील अवस्थी, उज्जवल कुमार, विवेक मिश्रा समेत 40 से ज्यादा अउआ के आजीवन सदस्यों ने हिस्सा लिया। एडवोकेट रमेश शर्मा को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा सदस्य रहा होगा, जिसने हंगामे में हिस्सा न लिया हो।

